भारत में शासन व्यवस्था संघीय स्वरूप की है, लेकिन इसमें मजबूत केंद्रीय झुकाव देखा जाता है। संविधान में “फेडरेशन” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि भारत को “राज्यों का संघ (Union of States)” कहा गया है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि यह संघ अविभाज्य है और राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।
भारत की संघीय व्यवस्था का विकास भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 से हुआ, जिसे 1950 में संविधान द्वारा अंतिम रूप दिया गया।
संघीय व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए संविधान ने केंद्र–राज्य संबंधों का एक विस्तृत ढांचा प्रदान किया है, जिसका अध्ययन तीन प्रमुख भागों में किया जाता है:
- विधायी संबंध
- प्रशासनिक संबंध
- वित्तीय संबंध
भारतीय संघवाद की प्रकृति
भारतीय संघवाद सहकारी (Cooperative Federalism) है, न कि प्रतिस्पर्धात्मक। केंद्र और राज्य अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च होते हुए भी निरंतर सहयोग और समन्वय पर निर्भर करते हैं।
संविधान ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और राष्ट्रीय हित की रक्षा हेतु केंद्र को कुछ अतिरिक्त शक्तियाँ प्रदान की हैं।
संवैधानिक वर्गीकरण
| पहलू | अनुच्छेद |
|---|---|
| विधायी संबंध | अनुच्छेद 245–255 |
| प्रशासनिक संबंध | अनुच्छेद 256–263 |
| वित्तीय संबंध | अनुच्छेद 268–293 |
👉 नीचे प्रत्येक पहलू का विस्तृत विवरण दिया गया है।
विधायी संबंध
प्रशासनिक संबंध
वित्तीय संबंध
निष्कर्ष
केंद्र–राज्य संबंध भारतीय संघीय व्यवस्था की रीढ़ हैं। इनका संतुलित संचालन राष्ट्रीय एकता को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय विविधता का सम्मान करता है। अत्यधिक केंद्रीकरण या अत्यधिक स्वायत्तता – दोनों ही संघीय संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

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