संविधान के वैचारिक तत्‍व: उद्देशिका


भारत के संविधान के उद्देश्य, जो इसकी मूल भावना को दर्शाते हैं, मुख्य रूप से इसकी प्रस्तावना (Preamble) में निहित हैं, जो संविधान के दर्शन और आत्मा के रूप में कार्य करते है। संविधान वह सर्वोच्च कानून है, जो सामाजिक अखंडता को बनाए रखने और पूरे देश में सद्भाव को बढ़ावा देने में मदद करता है। यह उन लक्ष्यों को भी स्पष्ट करते है जिन्हें प्राप्त करने के लिए राज्य को अपने नागरिकों के लिए प्रयास करना चाहिए। इन उद्देश्यों को दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: संप्रभुता (भारतीय राज्य की प्रकृति का वर्णन) और आकांक्षाएँ (नागरिकों के लिए सुनिश्चित किए जाने वाले लक्ष्य)।

मूलभूत उद्देश्य (नागरिकों के लिए आकांक्षाएँ)

उद्देश्यसंविधान क्या सुनिश्चित करना चाहता है संवैधानिक पूर्ति
न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक)1. सामाजिक न्याय: जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का उन्मूलन।
2. आर्थिक न्याय: धन और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण।
3. राजनीतिक न्याय: सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकार और अवसर।
मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 16) और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) (अनुच्छेद 38, 39, आदि)।
स्वतंत्रता (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की) 1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
2. धार्मिक स्वतंत्रता।
3. सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उचित प्रतिबंधों के अधीन स्वतंत्रता।
मौलिक अधिकार, मुख्य रूप से अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता)।
समता/समानता (प्रतिष्ठा और अवसर की) 1. कानून के समक्ष समान दर्जा।
2. सार्वजनिक रोज़गार में समान अवसर।
3. अस्पृश्यता और उपाधियों का उन्मूलन।
मौलिक अधिकार, मुख्य रूप से अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोज़गार में अवसर की समानता)।
बंधुता (व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करना) 1. सभी नागरिकों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देना।
2. राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाए रखना।
3. प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करना।
मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) और एकीकृत नागरिकता और संघीय संरचना को बढ़ावा देने वाले विभिन्न संवैधानिक प्रावधान

राज्य की प्रकृति को परिभाषित करने वाले उद्देश्य

प्रस्तावना में भारतीय राज्य की प्रकृति भी निर्धारित की गई है, जो इसका आधारभूत उद्देश्य है:

उद्देश्य महत्त्व
संप्रभु (Sovereign)भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है, जो किसी बाहरी नियंत्रण से मुक्त और आंतरिक रूप से सर्वोच्च है।
समाजवादी (Socialist)(42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) लोकतांत्रिक समाजवाद के मॉडल का पालन करते हुए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करने का लक्ष्य।
पंथनिरपेक्ष (Secular)(42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान और सुरक्षा की गारंटी (सकारात्मक पंथनिरपेक्षता)।
लोकतंत्रात्मक (Democratic)सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
गणराज्य (Republic)राज्य का मुखिया (राष्ट्रपति) वंशानुगत नहीं, बल्कि निर्वाचित होता है।

उद्देश्यों का महत्व

उद्देश्‍य एक जीवन शैली प्रदान करते है। इसमें बंधुत्व, स्वतंत्रता और समानता, सुखी जीवन की अवधारणा के रूप में शामिल हैं और इन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

  • स्वतंत्रता को समानता से अलग नहीं किया जा सकता; समानता को स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता। न ही स्वतंत्रता और समानता को बंधुत्व से अलग किया जा सकता है।
  • समानता के बिना, स्वतंत्रता, बहुतों पर कुछ लोगों की सर्वोच्चता को जन्म देगी।
  • स्वतंत्रता के बिना समानता, व्यक्तिगत पहल को समाप्त कर देगी।
  • बंधुत्व के बिना, स्वतंत्रता, बहुतों पर कुछ लोगों की सर्वोच्चता को जन्म देगी।
  • बंधुत्व के बिना, स्वतंत्रता और समानता, चीजों का स्वाभाविक क्रम नहीं बन सकते।
PREVIOUS YEAR QUESTIONS

प्रस्तावना में दिए गए भारतीय संविधान के उद्देश्यों को समझाइए। इन्हें कैसे लागू किया गया है? (MPPSC 2024)

बंधुत्व संविधान का सबसे उपेक्षित उद्देश्य है।” टिप्पणी कीजिए। (MPPSC 2023)

संविधान के उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम की आकांक्षाओं को दर्शाते हैं।” उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। (UPPSC 2024)

भारत की विविधता के संदर्भ में ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ के संवैधानिक उद्देश्य के महत्व का विश्लेषण कीजिए। (UPPSC 2023)

प्रस्तावना संविधान की कुंजी है।” प्रस्तावना में दिए गए उद्देश्यों को समझाइए। (RPSC 2024)

स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक उद्देश्य एक-दूसरे को कैसे पूरा करते हैं? (RPSC 2022)


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