मूल ढॉंंचा एवं प्रमुख संशोधन


भारतीय संविधान का मूल ढाँचा सिद्धांत

मूल ढाँचा सिद्धांत का तात्पर्य है कि संविधान के कुछ बुनियादी या आवश्यक लक्षण ऐसे हैं जिन्हें संसद अपनी संशोधन शक्ति (अनुच्छेद 368 के तहत) का उपयोग करके नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती। भारतीय संविधान का मूल ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो संविधान की सर्वोच्चता और उसके मौलिक चरित्र की रक्षा करता है। यह सिद्धांत संसद की संशोधन शक्ति पर एक सीमा निर्धारित करता है।

सिद्धांत का उद्भव

यह सिद्धांत एक ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय से उभरा:

  • मामला: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद (1973)
  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस महत्वपूर्ण निर्णय में माना कि संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन वह संविधान के मूल ढाँचे को नहीं बदल सकती। यह निर्णय संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए एक प्रहरी (Guard) के रूप में कार्य करता है।

मुख्य सिद्धांत

संविधान का मूल ढाँचा सिद्धांत इस बात पर ज़ोर देता है कि:

  • संविधान के वे पहलू जो इसकी पहचान, आत्मा और दर्शन को दर्शाते हैं, अपरिवर्तनीय हैं।
  • यह सिद्धांत न्यायपालिका को यह शक्ति देता है कि वह यह निर्धारित करे कि कोई विशेष संशोधन मूल ढाँचे का उल्लंघन कर रहा है या नहीं (न्यायिक समीक्षा)।

महत्व

मूल ढाँचा सिद्धांत भारतीय राजनीति और संवैधानिक कानून के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  1. संसद की शक्ति पर अंकुश: यह संसद की निरंकुशता पर एक संवैधानिक सीमा लगाता है, यह सुनिश्चित करता है कि वह बहुमत के बल पर संविधान के मूल सिद्धांतों को नष्ट न कर दे।
  2. संविधान की आत्मा की रक्षा: यह भारतीय लोकतंत्र के आवश्यक मूल्यों और आदर्शों की रक्षा करता है, जैसा कि संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी।
  3. न्यायपालिका की सर्वोच्चता: यह न्यायपालिका को संविधान के अंतिम व्याख्याकार और संरक्षक के रूप में सशक्त करता है।

मूल ढाँचे के प्रमुख घटक

सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर विभिन्न निर्णयों के माध्यम से कई विशेषताओं को मूल ढाँचे का हिस्सा घोषित किया है। मूल ढाँचा सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि जबकि संविधान समय के साथ विकसित हो सकता है (संशोधन के माध्यम से), इसकी पहचान और आत्मा हमेशा संरक्षित रहेगी। इनमें से कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • गणराज्य और लोकतांत्रिक स्वरूप
  • संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप
  • शक्तियों का पृथक्करण (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच)।
  • संघीय स्वरूप (कुछ एकात्मक विशेषताओं के साथ)।
  • न्यायिक समीक्षा (न्यायपालिका की समीक्षा शक्ति)।
  • व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा
  • कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उद्देश्य
  • संसदीय प्रणाली
  • मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्‍यों के बीच सामंजस्य और संतुलन
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
  • संविधान में संशोधन करने की संसद की सीमित शक्ति
  • अनुच्छेद 32, 136, 142 और 147 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को शक्ति
  • अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उच्च न्यायालय को शक्ति

संविधान को आकार देने वाले ऐतिहासिक संशोधन

भारतीय संविधान, जिसे एक जीवंत संविधान बनाने का लक्ष्य रखा गया था, देश की बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने और उभरते मुद्दों को सुलझाने के लिए 100 से अधिक शोधनों से गुज़र चुका है। मौलिक अधिकार, संघीय व्यवस्था और चुनावी सुधार अक्सर सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों के विषय रहे हैं।

संविधान बदलते समय की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार संशोधनों की अनुमति देता है। भारतीय संविधान न तो लचीला है और न ही कठोर, बल्कि दोनों का एक संश्लेषण है। भाग XX, अनुच्छेद 368 – संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्तियों और उसकी प्रक्रिया से संबंधित है।

संशोधन अधिनियमवर्षमुख्य प्रावधान और महत्व
1 संशोधन अधिनियम1951राज्य को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार दिया; भूमि सुधारों से संबंधित कुछ कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची जोड़ी गई।
7वाँ संशोधन अधिनियम1956राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन किया गया (राज्य पुनर्गठन अधिनियम); राज्यों का वर्गीकरण समाप्त किया; दो या दो से अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालयों का प्रावधान किया।
12वाँ संशोधन अधिनियम1962गोवा, दमन, और दीव को एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में भारतीय संघ में शामिल किया गया।
24वाँ संशोधन अधिनियम1971संसद की संविधान के किसी भी भाग में, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, संशोधन करने की शक्ति की पुष्टि की; राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक पर अपनी सहमति देना अनिवार्य किया।
36वाँ संशोधन अधिनियम1975सिक्किम को भारतीय संघ के एक राज्य के रूप में शामिल किया गया।
42वाँ संशोधन अधिनियम1976‘लघु-संविधान’। प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े; मौलिक कर्तव्य (भाग IV-A) जोड़े; राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य किया; शिक्षा और वन जैसे विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया।
44वाँ संशोधन अधिनियम1978लोकतांत्रिक मूल्यों को बहाल किया। संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर कानूनी अधिकार बनाया (अनुच्छेद 300A); राष्ट्रीय आपातकाल के लिए ‘आंतरिक अशांति‘ शब्द को ‘सशस्त्र विद्रोह’ से बदला; लोकसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष बहाल किया; राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का अधिकार दिया।
52वाँ संशोधन अधिनियम1985दसवीं अनुसूची जोड़ी, जिसमें राजनीतिक दल-बदल को रोकने के लिए दल-बदल विरोधी कानून पेश किया गया।
61वाँ संशोधन अधिनियम1989लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।
73वाँ संशोधन अधिनियम1992ग्रामीण स्थानीय शासन के लिए पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया (भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची)।
74वाँ संशोधन अधिनियम1992शहरी स्थानीय शासन के लिए शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया (भाग IX-A और बारहवीं अनुसूची)।
86वाँ संशोधन अधिनियम20026 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) बनाया; एक 11वाँ मौलिक कर्तव्य जोड़ा।
97वाँ संशोधन अधिनियम2011सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और सुरक्षा दी (नया मौलिक कर्तव्‍य अनुच्‍छेद 43-B, और नया भाग IX-B)।
101वाँ संशोधन अधिनियम2016वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया, जिससे पूरे देश में अप्रत्यक्ष करों का एकीकरण हुआ।
102 संशोधन अधिनियम2018राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
103 संशोधन अधिनियम2019शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक रोज़गार में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया।
106वाँ संशोधन अधिनियम2023लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया।
PREVIOUS YEAR QUESTIONS

“भारतीय संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढाँचे में नहीं।” टिप्पणी कीजिए। (MPPSC 2024)

अनुच्छेद 368 की न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में मूल ढाँचे के सिद्धांत के विकास और महत्व पर चर्चा कीजिए। (MPPSC 2022-23)

‘मूल ढाँचे’ के सिद्धांत ने राज्य को भारत के संविधान में निहित मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विश्लेषण कीजिए। (UPPSC 2024)

मूल ढाँचे का सिद्धांत संसद की संशोधन शक्ति को कैसे प्रभावित करता है? केशवानंद भारती मामले के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (RPSC 2023-24)


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